17 मार्च तक होलाष्टक, 15 मार्च से खरमास ; बिना शुभ मुहूर्त के शपथ लेने को विवश कर देंगे आसमानी सितारे?; क्या असर होगा?

चंडीगढ़ (आज़ाद वार्ता)
14 अप्रैल तक शुभ कामों पर रहेगी रोक;; 14 मार्च को सूर्य कुंभ राशि से निकलकर मीन में आ जाएगा। जो कि 13 अप्रैल तक इसी राशि में रहेगा। सूर्य के मीन राशि में रहने को धर्म और ज्योतिष ग्रंथों में खरमास कहा गया है। इस एक महीने के दौरान मांगलिक काम नहीं किए जाएंगे। खरमास के दौरान मांगलिक काम नहीं किए जाते हैं। सभी संस्कार और गृह प्रवेश सहित हर तरह के मांगलिक अब 14 अप्रैल के बाद शुरू होंगे।
हिंदू पंचाग के मुताबिक 14 मार्च की रात 2.39 बजे सूर्य कुंभ से निकलकर गुरु की राशि मीन में प्रवेश करेंगे और 14 अप्रैल को सुबह 10.53 बजे मेष राशि में प्रवेश करने से खरमास समाप्त हो जाएगा।

होलाष्टक गुरुवार को 10 मार्च को अष्टमी तिथि से शुरू हुए है तथा होलाष्टक 17 मार्च 22 को होलिका दहन के साथ खत्म होगे, परन्तु शुभ मूहूर्त का अवसर फिर भी नही मिल रहा, पंचांग के अनुसार 15 मार्च से खरमास की शुरूआत होने जा रही है. हिंदू धर्म में खरमास को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. खरमास 15 मार्च 2022 से शुरू हो जाएंगे और 14 अप्रैल 2022 को खत्म होगा. इस दौरान किसी भी तरह का शुभ काम नहीं किया जाता है. मान्यता है कि इस महीने में सूर्य की चाल धीमी हो जाती है. खरमास में नए या शुभ काम करने से अशुभ फल मिलता है.
हिंदू धर्म में खरमास को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. जब से सूर्य बृहस्पति राशि मीन में प्रवेश करता है तभी से खरमास या मलमास या अधिकमास शुरू हो जाता है. हिन्दू धर्म में यह महीना शुभ नहीं माना जाता है, इसलिए इस महीने में नए या शुभ काम नहीं किए जाते हैं. खरमास महीने के अपने कुछ अलग नियम बताए गए हैं.
हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार कोई भी शुभ कार्य बिना सही मुहूर्त देखे शुरू नहीं किया जा सकता है. काम की शुरुआत से पहले शुभ समय या मुहूर्त या ग्रहण-नक्षण की गणना या जानकारी जरूर जुटाते हैं. इसके अलावा सूर्य की चाल पर भी जरूर ध्यान दिया जाता है. मगर खरमास महीने में कोई भी शुभ कार्य नहीं होते हें.
ज्योतिष नजरिये से ये सप्ताह खास रहेगा। इस सप्ताह की शुरुआत में ही सूर्य राशि बदलकर मीन आ जाएगा। 14 से 20 मार्च तक का पंचांग ; 14 मार्च, सोमवार – फाल्गुन शुक्ल पक्ष, एकादशी 15 मार्च, मंगलवार – फाल्गुन शुक्ल पक्ष, द्वादशी
16 मार्च, बुधवार – फाल्गुन शुक्ल पक्ष, त्रयोदशी 17 मार्च, गुरुवार – फाल्गुन शुक्ल पक्ष, चतुर्दशी और पूर्णिमा 18 मार्च, शुक्रवार – फाल्गुन शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा और प्रतिपदा
19 मार्च, शनिवार – चैत्र कृष्ण पक्ष, प्रतिपदा 20 मार्च, रविवार – चैत्र कृष्ण पक्ष, द्वितीया
ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि ऋतुओं का खगोलीय आधार सूर्य होता है। इसके राशि परिवर्तन से ही मौसम बदलते हैं। ज्योतिष के सबसे खास ग्रंथ सूर्यसिद्धांत में बताया है कि जब सूर्य मीन और मेष राशि में हो तो वसंत शुरू होता है। जो कि इस बार 15 मार्च से शुरू होगी और 14 मई तक रहेगी। इस ऋतु की शुरुआत में सूर्य अपनी मित्र और उच्च राशि यानी मीन और मेष में रहता है। इस ऋतु में ही इंसानों और जीवों में प्रजनन शक्ति बढ़ जाती है। इसलिए इसे सृजन की ऋतु भी कहते हैं। माना जाता है वैदिक काल की पहली ऋतु वसंत ही थी। जब ऋतुएं बदलती हैं तो मानसिक और शारीरिक बदलाव भी होते हैं। जिससे शरीर में त्रिदोष बढ़ते हैं
वही वैज्ञानिक कारणों के अनुसार होलाष्टक में फाल्गुन शुक्ल पक्ष में अष्टमी से प्रकृति में नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती है। इसलिए अक्सर इस दौरान गृह प्रवेश या कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता है। होली के बाद उत्तराखंड का अगला मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण कार्यक्रम घोषित किया जाएगा क्योंकि बीजेपी होलाष्टक में शुभ कार्य नही करना चाहती
होली के बाद उत्तराखंड का अगला मुख्यमंत्री घोषित किया जाएगा क्योंकि फिलहाल होलाष्टक लग गए हैं और इन होलाष्टक में शुभ कार्य नहीं होते हैं होली के बाद होलाष्टक समाप्त होने पर नए मुख्यमंत्री को शपथ दिलाई जाएगी। 18 मार्च को होली पड़ने वाली है फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को होलाष्टक लग जाता है, जो पूर्णिमा तक जारी रहता है। ऐसे में अटकलें लगाई जा रही हैं कि होली के बाद ही नई विधानसभा सत्र के लिए चुने जाने वाले नए विधायक, मंत्री पद की शपथ लेंगे।
इसके बाद भी बिना शुभ मुहूर्त के शपथ लेने को विवश कर देंगे आसमानी सितारे; एक्सेकलुसिव रिपोर्ट
19 मार्च २०२२ को विधायक दल की मीटिंग बुलाई जाएगी, जिसमें नए सीएम के नाम पर आधिकारिक मुहर लग जाएगी और फिर 20 मार्च को शपथ ग्रहण समारोह होगा. बीजेपी संगठन द्वारा नवनिर्वाचित विधायकों को होली के बाद देहरादून में रहने का निर्देश दिया गया है.” होलाष्टक समाप्त होने पर नए मुख्यमंत्री को शपथ दिलाई जाएगी।
खरमास के दौरान नियमों का पालन करना जरूरी होती है। इस दौरान मांगलिक कार्यों की मनाही होती है. इसलिए इन दिनों में कोई भी शुभ कार्य न करें। ज्योतिषियों के अनुसार खरमास में बेटी या बहू की विदाई नहीं करनी चाहिए। देवी-देवताओं और पक्षियों के प्रति अप्रिय शब्दों का प्रयोग बिल्कुल न करें।
होली के पहले पड़ने वाले होलाष्टक में अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादश को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहु ग्रह उग्र रहते हैं। इस कारण इन आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है।
10 मार्च 22 को विधानसभा चुनाव परिणाम आ गये है, वही होलिका दहन के हफ्ते भर पहले से होलाष्टक गुरुवार को 10 मार्च को अष्टमी तिथि से शुरू हो गये हैं। 10 मार्च से शुरू होने वाला होलाष्टक 17 तारीख को होलिका दहन के साथ खत्म हो जाएगे। पूरे सप्ताह होलाष्टक दोष होने की वजह से सभी शुभ काम पर रोक है।ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि ज्योतिष ग्रंथों में होलाष्टक को दोष माना जाता है, अशुभ मुहूर्त में किए गए कामों से कष्ट और हानि की आशंका रहती है। होलाष्टक में शुभ कामों की मनाही होती है इसीलिए बीजेपी होली के बाद उततराखण्ड और उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण कर रही है परन्तु 15 मार्च से खरमास शुरू हो जाएगा
15 मार्च से खरमास शुरू हो जाएगा ;;कोई भी शुभ संस्कार नहीं किए जाते हैं।
वही होलाष्टक खत्म होने से पहले ही 15 मार्च से खरमास शुरू हो जाएगा, काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी का कहना है कि 14 मार्च से सूर्य मीन राशि में प्रवेश करेगा, जो 14 अप्रैल तक रहेगा। सूर्य के राशि बदलने से खरमास की शुरुआत हो जाएगी। इससे कोई भी शुभ संस्कार नहीं किए जाते हैं। इसलिए अब 14 अप्रैल के बाद शादियां शुरू होंगी। इनमें अगला विवाह मुहूर्त 17 अप्रैल को रहेगा।
ऐसे में बिना शुभ मुहूर्त के 5 राज्यो के मुख्यमंत्री शपथ लेंगे, इसका क्या असर होगा, सितारो का अध्ययन मनन करने वाले ज्योतिष विद की भविष्यवाणी शपथ ग्रहण के बाद ही आज़ाद वार्ता न्यूज़ पोर्टल में प्रकाशित होगी
ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति ग्रह का विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि मीन और धनु बृहस्पति की राशि है। ज्योतिषाचार्य कहते है कि सूर्य के मीन राशि में 14 व 15 मार्च मध्य रात्रि 12:15 बजे प्रवेश करेगा, जिससे मीन संक्रांति कहलाएगी। सूर्य के मीन में प्रवेश के कारण सूर्य के प्रभाव से बृहस्पति की सक्रियता कम हो जाती है। इसलिए इस समय को खरमास या मलमास के नाम से जाना जाता है। यह साल में दो बार आता है, जब सूर्य धनु में प्रवेश करता है और मीन में राशि परिवर्तन करता है तब खरमास या मलमास कहलाता है। मीन संक्रांति हिंदुओं का एक प्रमुख त्याैहार माना जाता है। मीन संक्रांति को साल के आखिरी माह की संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह साल का आखिरी माह होता है।
नकारात्मक शक्तियों में भी कमी आ जाती है ; प्रकृति में नया जीवन शुरू हो जाता है।
मीन संक्रांति का शास्त्रों में बड़ा महत्व बताया जाता है। मीन संक्रांति से सूरज की गति उत्तरायण की तरफ बढ़ रही होती है। उत्तरायण काल में सूरज उत्तर दिशा की ओर उदय होता दिखाई देता है। उसमें दिन का समय बढ़ जाता है और रातें छोटी हो जाती हैं। साथ ही प्रकृति में नया जीवन शुरू हो जाता है। इस समय वातावरण और हवा भी शुद्ध हो जाती है। ऐसे में देव उपासना, योग, ध्यान, पूजा, तन, मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं। इस समय रातें छोटी होने के कारण नकारात्मक शक्तियों में भी कमी आ जाती है और दिन में ऊर्जा प्राप्त होती है।
मीन संक्रांति के दिन दान पुण्य करने के लिए बहुत शुभ दिन माना जाता है। ब्राह्मण और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र आदि का दान दिया जाता है। भूमि का दान करने से अत्यंत सुख समृद्धि व वृद्धि होती है।